दो दिन मे एक ट्रेड मिली, मिली और फिर चल पड़ी : माइंड सेट का नतीजा
आजकल यह बात दिल मे बैठी हुईं है कि, ट्रेडिंग मे सफलता के गुणसूत्र सेटअप मे नही छुपे हुए है. ट्रेडिंग का असली राज माइंड सेट और साइकोलोजी मे है.
मैंने अपनी साइकोलोजी को थिर करने के लिए अपने रिस्क को फिक्स कर लिया है. कुल केपिटल की 1% रिस्क.
इसी वजह से इमोशनल बेलेंस बना रहता है.
और फल यह निकलता है कि ट्रेडिंग इमोशनल न होकर स्थिर हों गयी है.
मुझे लगता है इस तरह कि प्रेक्टिस से मुझे एक दो महीने मे ट्रेड्स को लम्बा होल्ड करने का अनुभव भी आ जायेगा.
कल क्या हुआ....!
दिन मे बिना सेटअप के दो ट्रेड लिए मैंने. दोनों मे स्टॉप लॉस हुए, एक मे तो मै एंटर करके ही वापस निकल गया. मुझे लग गया कि गलती हों गयी है.
शाम को जब मै घर बैठा था, तो मुझे अहसास हुआ कि इस जगह मेरी साइकोलोजी सेट हों रही है. अपना माइंड सेट स्टेबल महसूस किया मैंने.
ये गजब बात थी. ऐसा महसूस करना, यूँ था मानो मै अपने जोन मे, अपने केंद्र मे स्थिर हों गया हूं.
जब पेनल ओपन किया तो मुझे सेटअप दिखा. माइंडसेट स्टेबल लगा. रिस्क मैनेज़ किया.
और मै बैठ गया ट्रेड मे.
पिछले सात घंटे से देख रहा था सेटअप को, इंतज़ार हुआ लम्बा.
ट्रेड की पैरामिडिंग भी की. और डेढ़ दो घंटे मे 1:3 का टारगेट पूरा हों गया.
ट्रेडिंग और आम जीवन को हम कितना अलग अलग तरह से देखते है.
आम जीवन मे हम जितना विवेकशील होते है, ट्रेडिंग मे हम उतना ही उतावले और शार्ट टेम्पर्ड हों जाते है.
इसकी मूल वजह है बड़े स्टॉप लॉस की गुंजाईश. अगर रिस्क बड़े हों, तो इंसान मुश्किल मे पड़ जाता है. अगर रिस्क केलकुलेटड नही है तो अच्छा भला सन्यासी भी अपना आपा खो देता है.
मेरा रिस्क 2% है, मै ट्रेड को राइड करने मे सक्षम हूं. मै घबरा नही जाऊंगा.
इस माइंड सेट को स्थिर करने मे मुझे अभी समय लगेगा. ज्यादा नही लेकिन एक दो माह तो लगेंगे.
Comments
Post a Comment